आपातकाल के दौरान जेल की यातनाएं सहने वाले लोगों को खटटर सरकार दे रही है दस हजार रूपये प्रतिमाह : महावीर भारद्वाज़

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Mahavir Bhardwaj

गुरुग्राम, 25 जून 2020 (मनप्रीत कौर) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता महावीर भारद्वाज का कहना है की आज ही के दिन मध्य रात्रि को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोप दिया था।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा अन्य देशभक्त संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।स्वतंत्र पत्रकारिता पर अंकुश लग गया था।समूचे समाज में एक भय का वातावरण पैदा हो गया था। संविधान के मूलभूत अधिकारों को निरस्त कर दिया गया था। पूरा देश एक तानाशाही के मजबूत एवं निरंकुश शिकंजे में कस दिया गया। देश की सभी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं को पकड़ कर जेल में ठूंस दिया गया। 15 अगस्त 1947 को असंख्य बलिदानों के बाद जब अंग्रेजों की गुलामी से देश को मुक्त किया गया तो किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि आजादी के 48 वर्ष बाद देश में अपनी सत्ता बचाने के लिए एक महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री लोकतंत्र को एक अंधेरे की ओर धकेल देंगे।1974 से ही देश में भ्रष्टाचार एवं बेरोजगारी के खिलाफ जन आंदोलन खड़ा हो गया था जो कि 1975 के आते-आते अपने चरम पर पहुंच गया था। गुजरात एवं बिहार के छात्र आंदोलन की इसमें अहम भूमिका थी। देश के लोकप्रिय नेता जयप्रकाश नारायण ने इस आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया था जिसमें अटल बिहारी वाजपेई,लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई तथा राजनारायण मधु लिमए जैसे नेताओं का भरपूर सहयोग प्राप्त था। 26 जून को देश के प्रमुख समाचार पत्रों की प्रेस की बिजली काट दी गई। रामनाथ गोयंका जैस निर्भीक पत्रकारों को रातों-रात जेल में डाल दिया गया। राजनेताओं की गिरफ्तारी करने के बाद राष्ट्रवादी सामाजिक संगठनों के प्रमुखों एवं सदस्यों की पकड़ धकड़ शुरू हो गई। एक बार तो समूचा देश पूरी तरह से सहम सा गया लेकिन कुछ समय बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेतृत्व में देश में आपातकाल के खिलाफ सत्याग्रह का दौर शुरू हो गया। पुलिस एवं प्रशासन के लोग द्वारा अत्याचार एवं यातनाओं के बावजूद समूचे देश से लगभग डेढ़ लाख लोगों ने अपनी गिरफ्तारी दी। सत्याग्रह करके तानाशाही को चुनौती देने वालों में सातवीं कक्षा के विद्यार्थियों से लेकर सभी वर्गों एवं आयु के लोग शामिल थे। जो जुल्म आजाद भारत की पुलिस ने किए वैसे तो अंग्रेजों ने भी शायद नहीं किया होगा। यहां देश के युवकों को यह बताना आवश्यक है कि सत्याग्रह करने वालों पर डंडे लाठियों से मारना, बर्फ की सिल्लियों पर नंगे लिटाना,पाजामा में जिंदा चूहे छोड़ना, जलती हुई सिगरेट पैरों पर लगाना यह उनकी कार्यशैली के अंग थे। देश में कहां पर क्या हो रहा है यह समाचार किसी को पता नहीं चल रहा था। जैसे पूरा देश एक जेल में बदल दिया गया था। ऐसे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने प्रत्येक राज्य में भूमिगत तरीके से छोटे समाचार पत्र निकालकर लोगों तक सही सूचनाएं भी पहुंचाई। मैं महेंद्रगढ़ कॉलेज का 2 वर्ष तक छात्र संघ का अध्यक्ष रहने के बाद 1975 में भिवानी के के.एम. कॉलेज ऑफ एजुकेशन में छात्र संघ का प्रधान था। मैं भी आपातकाल के विरुद्ध अपनी आवाज उठाने के लिए लड़ा था। नवंबर 1975 में 9 लोगों को साथ लेकर रेवाड़ी में मैंने सत्याग्रह किया। हम पर भरपूर अत्याचार किया गया। बाल्यकाल में विवाह होने के कारण मैं एक 3 वर्षीय बेटी का पिता था तथा मेरी पत्नी सुशीला उस समय गर्भवती थी। मैंने गांव में अपने माता-पिता एवं पत्नी से अपना निर्णय सुनाते समय साफ तौर पर कहा था कि देश के लिए सत्याग्रह करने जा रहा हूं हम वापस आ भी सकते हैं और नहीं भी, वह अपनी मानसिकता को भावी परिस्थिति के लिए तैयार कर लो परिवार के लोगों ने मुझे अपनी सहमति दे दी थी। आपातकाल की वास्तविकता का परिचय देश की भावी पीढ़ी को होना चाहिए। यह आजादी की दूसरी लड़ाई थी जिसमें तानाशाह इंदिरा गांधी को पराजित कर देश में फिर से लोकतंत्र की बहाली हुई थी। 21 मार्च 1977 को आपातकाल की समाप्ति हुई उसके बाद देश में फिर से लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव हुए देश पर आपातकाल लगाने का कारण 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा का वह फैसला था जिसमें श्रीमती इंदिरा गांधी के 1971 के रायबरेली में लड़े गई चुनाव को अवैध घोषित किया गया। देश के जाने-माने नेता राजनारायण ने इंदिरा गांधी के खिलाफ याचिका दायर की थी। हरियाणा की वर्तमान सरकार ने आपातकाल जेल की यातनाएं सहने वाले लोगों को लोकतंत्र सेनानी का दर्जा देकर सम्मानित किया है। उन्हें ताम्रपत्र से भी नवाजा गया है। इतना ही नहीं प्रतिमाह 10000 रूपये सम्मान राशि भी सभी लोकतंत्र सेनानियों को प्रदान की जा रही है।