सुन लो हिंदुस्तान, हर घंटे में एक किसान पहुंच रहा शमशान…

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sandeep mishra

 

जिसकी भुजाएं पहाड़ को चीर देती हैं, जिसके पाँव दलदल में भी जम जाते हैं, जिसका जिस्म सूरज को तपा देता है, हौसला जिसका बर्फ को गला देता है, जिसके परिश्रम हर श्रम का श्रृंगार है….वह अन्नदाता गरीबी से लाचार है।

सिर से पांव तक पसीने में सना निर्वस्त्र, निरीह, देश का पेट भरने वाला किसान अपने ही निवाले को मोहताज मौत को गले लगाने को मजबूर है। उसकी यह मजबूरी उसे कहीं फांसी के फंदे पर लटका देती है, तो कहीं उसकी आस सल्फास पर जा टिकती है, कहीं उसकी उम्मीद गहरे कुएं में गोता लगा देती है, तो कहीं धधकती आग बदन को राख कर उसकी निशानी मिटा देती है। घड़ी एक घंटे का सफर भी पूरा नहीं कर पाती कि किसान बेजान हो शमशान के दरवाजे पर आ सिमटता है। प्रत्येक एक घंटे में एक किसान पहुंच रहा है शमशान, यह आंकड़े सरकारी हैं अन्नदाता की यह दुर्दशा किसकी जिम्मेदारी है।

सन 2016 के आंकड़े जारी किए गए हैं, इस वर्ष किसान, कास्तकार, भूस्वामी, जिन्होंने मौत के आने से पहले मौत को गले लगा लिया, उनकी संख्या 11,389 बताइ हैं, यानी हर दिन 31 परेशान किसान अपने सांसो की बलि चढ़ा रहे है। गरीबी, लाचारी, तानाशाही, दुत्कार, धिक्कार से पीछा छुड़ाने के लिए मौत के आगोश में चित्कार छोड़ सो गए, वह देश के अन्नदाता सदा सदा के लिए कहीं खो गए।

हताश किसान की एक चिता बुझने से पहले ही धधक पड़ती है दूसरी चिता, दूसरी चिता के सामने कतार लागए ठिठक जाती है फिर तीसरी, चौथी, पांचवी…यह बिना रुके बिना थके चिताओं का दिया जो देश में अनवरत जल रहा है,यह किसान की विदाई के बाद फफक- फफक कर धधक-धधक कर पूछ रहा है कब किसान की मौत पर किसी के अश्क छलकेंगे? कब बे आस किसान की विदाई पर किसी को रंज होगा? कृषक के चिता की अग्नि का यह तंज हिंदुस्तान के मुंह पर करारा वार है। जिससे आंखे मूंदे सरकार है अगर ऐसी ही अंधी, बहरी, गूंगी, लंगडी हमारी सरकार है तो ऐसी सरकार को धिक्कार है दुत्कार है।

कभी बारिश का कहर, कभी तूफान का असर, कभी अकेले की मार,कभी नदियों की धार, कभी सूखा फ़सल सुखा जाता है, तो कभी ओस उसे खामोश कर देती है। प्रकृति की रीत से लड़ते-झगड़ते कर्ज में दबता-डूबता किसान सरकारी अनदेखी का शिकार, सरकारी सहायता से महरुम, सूदखोरों के जुल्मों जलालत मे आकंठ डूबा हर उम्मीद की चौखट से बेआस लौटने के बाद मौत की मंजिल को ठिकाना मान कभी न लौटने को बढ़ रहा है। अन्नदाता कि यह बेरुखी देश की दुर्दशा का वह गान है जिसे कभी कोई गुनगुनाने का साहस नहीं जुटा पाया।

अन्नदाता ही जिस मुल्क में भूखा मर रहा है उस वतन की ऊंची अट्टालिकाए मौत के अटट्हासा से ज्यादा कुछ नहीं, उस देश के ये चमकते जगमगाते कंक्रीट के जंगल किसान की कब्रगाह से ज्यादा कुछ नहीं,यह चमक-दमक सब ठीक ही है अगर किसान हर घंटे आत्महत्या को मजबूर हैं।

सरकार भले पेट्रोल पर 5 ₹ बढ़ा दे, दारु के दोग़ुने भाव कर दे, सिगरेट पर शेस गुटके के भाव बढ़ा दे, और एक महीने के ही कर भार से पूरे आवाम के किसान का भार हर ले, नहीं अन्नदाता को कर्ज मुक्त कर दें उनकी जान बचा ले। किसान जवान के लिए साथ खड़े होने के लिए हिंदुस्तान का बच्चा बच्चा तैयार है, सरकार को कोई ऐसी आपात योजना का खाका बनाना ही होगा जिससे कृषक मौत के जाल से बच निकले। हर घड़ी मरता किसान, हर पल रोता किसान,हर वक्त दुखों का पहाड़ ढोता किसान, लाचार, मोहताज, मायूस शमशान पहुंचता किसान देश की कंगाली बदहाली लाचारी की वो जिंदा दास्तां है जो किसानो कि खुदकुशी के किस्सो से सजी हैं। जिसे अब सदा सदा के लिए मिटाना ही होगा, सरकार जागे तो ठीक नहीं तो उठो हिंदवासियों हमें मिलजुल कर परेशान, हताश, किसान की आवाज बनना होगा, इस सोती हुई सरकार को जगाना होगा किसानों को बचाना होगा…जय हिंद। – संदीप मिश्र