सामाजिक चेतना के लिए दयानन्द सरस्वती का योगदान अद्वितीय – गोविंद भारद्वाज

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Dayanand Saraswati

 

महेंद्रगढ़, 14 फरवरी 2019 (विनीत पंसारी) – हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय (हकेंवि), महेंद्रगढ़ में गुरूवार को ‘स्वामी दयानन्द सरस्वती के दर्शन में वेद-विज्ञान एवं आध्यात्मिकता‘ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी की शुरूआत हुई। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग व हरियाणा संस्कृत अकादमी, पंचकूला के सहयोग से आयोजित इस संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए हरियाणा एग्रो इण्डस्ट्रीज लिमिटेड के अध्यक्ष गोविंद भारद्वाज ने स्वामी दयानन्द सरस्वती के योगदान पर चर्चा करते हुए कहा कि स्वामी जी ने समाज में चेतना लाने का कार्य किया। उन्होंने हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने के लिए जनजागरण का सहारा लिया और उनके ही प्रयासों का नतीजा है कि आज हम उनके वेद-विज्ञान व आध्यात्मिकता पर आधारित दर्शन की चर्चा कर रहे हैं।

गोविंद भारद्वाज ने अपने संबोधन ने हरियाणा की धरती को ब्रह्मवर्त बताते हुए कहा कि यह वही धरती है जहाँ विद्वानों का वास रहा है और यहां की ढ़ोसी की पहाड़ी संस्कृति व कृषि के विकास का प्रमुख केंद्र रही है। उन्होंने च्यवन ऋषि का जिक्र करते हुए कहा कि ये वही ऋषि थे जिन्होंने समाज को नई चेतना प्रदान करने कार्य किया लेकिन आज हम उन्हें भूलाते जा रहे हैं। श्री भारद्वाज ने विद्यार्थियों व शिक्षकों से कहा कि वे हरियाणा की इस पावन धरती में रह रहे हैं तो उन्हें चाहिए कि वे एक बार ढ़ोसी की पहाड़ी और इसके इतिहास का अनुभव व्यक्तिगत रूप से अवश्य करें। आयोजन में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आर.सी. कुहाड़ के संदेश का उल्लेख करते हुए स्वामी दयानन्द सरस्वती पीठ के पीठाचार्य प्रो. रणवीर सिंह ने कहा कि यह आयोजन माननीय कुलपति की प्रेरणा व मार्गदर्शन से ही संभव हो सका। उन्होंने इस आयोजन के लिए प्रोत्साहित किया और उसी का नतीजा है कि आज हम देश के जानेमाने विद्वानों को एक मंच पर एकत्र कर पाए।

उद्घाटन सत्र में मुख्य वक्ता गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार के पूर्व कुलपति डॉ. सुरेंद्र कुमार ने कहा कि कोई भी विषय जोकि व्यक्ति समाज व देश के लिए उपयोगी है उसके लिए स्वामी जी ने अपने जीवन में भरसक प्रयास किए और यही कारण है कि स्वामी जी के विचारों की महत्ता आज भी बनी हुई है। नारी उत्थान की बात हो या उनके लिए मान-सम्मान की, स्वामी जी ने अपने जीवन काल में नारियों के हित में बढ़-चढ़कर कार्य किया। स्वामी जी ने वेदों में उपलब्ध विज्ञान को भी अनकेशः प्रकाशित किया है। इसके अलावा शिक्षा के क्षेत्र में भी स्वामी जी का योगदान उल्लेखनीय रहा है। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि हरियाणा संस्कृत अकादमी के निदेशक डॉ. सोमेश्वर दत्त शर्मा ने कहा कि संस्कृत के प्रचार-प्रसार की दिशा में केंद्र व राज्य की सरकार उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं और इसी का नतीजा है कि आज हम संस्कृत के प्रचार-प्रसार व इसके अध्ययन के लिए विद्यार्थियों को फैलोशिप की सुविधा प्रदान कर पा रहे हैं। डॉ. शर्मा ने कहा कि केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में संस्कृत में अध्ययन,चिंतन व लेखन कार्य पर खास ध्यान दिया जा रहा है और राज्य स्तर पर संस्कृत विश्वविद्यालय व संस्कृत बोर्ड की स्थापना इसी सोच का परिणाम है।

कार्यक्रम में स्वागत भाषण स्वामी दयानन्द सरस्वती पीठ के पाीठाचार्य प्रो. रणवीर सिंह ने दिया और उन्होंने बताया कि इस आयोजन के माध्यम से आने वाले दो दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों से आए विद्वान अपने विचार व शोध-पत्र प्रस्तुत करेंगे। प्रो. सिंह ने कहा कि यह आयोजन स्वामी दयानन्द सरस्वती के दर्शन में वेद-विज्ञान व आध्यात्मिकता को समझने का नया नजरिया प्रदान करेगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता शैक्षणिक अधिष्ठाता डॉ. बीर सिंह ने की और उन्होंने कहा कि विज्ञान वह माध्यम है जो हमें ईश्वरीय शक्तियों से अवगत कराने का कार्य करता है। उन्होंने कहा कि इसी सोच के चलते आइंस्टाइन को भारी आलोचना का सामना करना पड़ा था। डॉ. बीर सिंह ने स्वामी दयानन्द सरस्वती के विचारों का जिक्र करते हुए कहा कि आज भी वह समाज में चेतना के पोषक के तौर पर विद्यामान हैं और उनके दर्शन का लाभ अध्ययन-अध्यापन के माध्यम से आमजन तक पहुँच रहा है।

डॉ. रवि प्रकाश आर्य ने दोपहर बाद के सत्र में स्वामी दयानन्द के सामाजिक एवं आध्यात्मिक योगदान पर अत्यन्त प्रभावोत्पादक भाषण प्रस्तुत किया। उनके उदाहरणों के माध्यम से स्वामी जी की विद्वता पर प्रकाश डाला। विज्ञान एवं तकनीकी का प्रयोजन परोपकार होना चाहिए, पर्यावरण-प्रदूषक नहीं। इस सत्र की अध्यक्षता प्रेा. विभा अग्रवाल, निदेशक, संस्कृत एवं प्राच्चविद्या संस्थान, कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरूक्षेत्र ने की। डॉ. सुनीता सैनी, महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक व डॉ. श्रीभगवान, डॉ. रीजा आदि ने भी अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के प्रो. ब्रह्मदेव व दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली से डॉ. सत्यपाल सिंह ने भी संगोष्ठी में भाग लिया तथा अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन प्रो. अमर सिंह ने दिया और इस अवसर पर विभिन्न पीठों के अधिष्ठाता, विभागाध्यक्ष, प्रभारी, शिक्षक, विद्यार्थी व शोधार्थी उपस्थित रहे।